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कौटिल्य के आर्थिक विचार एवं अर्थशास्त्र की परिभाषा , आर्थिक अवधारणाएँ UPSC, PSC SPECIAL NOTES

{चाणक्य नीति} GK
Kautilya's economic thought and definition of economics
 { Economic thought }


कौटिल्य के आर्थिक विचार- वर्तमान सन्दर्भ में


कौटिल्य के आर्थिक विचार एवं अर्थशास्त्र का इतिहास



कौटिल्य के आर्थिक विचार


आचार्य कौटिल्य अर्थशास्त्र के प्रणेता माने गये हैं । कौटिल्य को चाणक्य , विष्णुगुप्त आदि नामों से जाना जाता है । चूंकि कौटिल्य की विचारधारा परम्परागत आदर्शवाद के विरोध में भौतिकवाद पर जोर देती है जो तत्कालीन धर्माचार्यो को उचित प्रतीत नहीं हुई इसीलिए उन्होंने कुटिलता का पुट देने के लिए उन्हें कौटिल्य नाम दे दिया । नन्दवंश का नाश कर चन्द्रगुप्त को राज्य सिंहासन पर बैठाकर राजवंश की स्थापना करने वाले आचार्य कौटिल्य ने समकालीन आर्थिक समस्याओं और अर्थव्यवस्था पर जितना अधिक चिंतन किया , उतना किसी अन्य आचार्य ने नहीं किया । उन्होंने आर्थिक नियमों के प्रतिपादन में जिन तर्को का प्रयोग और उल्लेख किया है , वे आज की परिस्थितियों में लागू किये जा सकते है ।

 अर्थशास्त्र में विभिन्न विषयों पर जो विचार वर्णित है वे निम्नलिखित है : 


कौटिल्य का अर्थशास्त्र ( Kautilya's Arthashastra ) 


कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्राचीन चिन्तन की नीतिशास्त्र परम्परा का प्रतिनिधि ग्रन्थ है । जैन ग्रन्थों एवं पुराणो ( भागवत पुराण , वायु पुराण , मतृस्य पुराण व ब्राह्मण पुराण के अनुसार हम यह कह सकते है कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना 321 एवं 300 ई.पू. के बीच में किया । वे मूलतः अर्थशास्त्री ( Economist ) नहीं थे बल्कि एक दार्शनिक , कूटनीतिज्ञ एवं विचारक थे । यह ग्रन्थ हमें तत्कालीन समय की उन आर्थिक व्यवस्थाओं व अवधारणाओं के बारे में जानकारी प्रदान करता है जिन्हें हम वर्तमान में भी लागू कर सकते है । इस ग्रन्थ में कुल 15 अधिकरण 150 अध्याय 180 विषय एवं 6000 लोक 


अर्थ एवं अर्थशास्त्र की परिभाषा ( Definition of wealth & economics ) 


कौटिल्य ने ज्ञान की शाखाओं को ' विद्या ' नाम दिया है तथा यह स्पष्ट किया है कि जिससे किसी विशेष संदर्भ में उचित अनुचित , कर्त्तव्य - अकर्त्तव्य का ज्ञान होता हो उसे' विद्या कहते है । उन्होंने ज्ञान की चार शाखाओं का वर्णन किया है- त्रयी , वार्त्ता , आन्वीक्षिकी व दण्डनीति | वार्त्ताशास्त्र में कृषि , पशुपालन , उद्योग और व्यापार को प्रधानता दी है जिससे भौतिक उपलब्धियों और सम्पत्ति आदि का अर्जन होता है । आन्वीक्षिकी वह मापदण्ड माना है जिसके द्वारा राजनीतिक एवं भौतिक उद्देश्य के लिए किए जाने वाले प्रयत्नों को संतुलित किया जा सके ।


 कौटिल्य ने अर्थ , धर्म और काम के आधार पर ही मानव जीवन को विभक्त किया है और इन तीनों में से उन्होंने अर्थ को प्रधानता दी , क्योंकि बिना अर्थ के किसी प्रकार की क्रिया संभव नहीं हो सकती है । कौटिल्य ने धर्म पर अर्थ को प्रधानता दी है । वे कहते है कि " सुख का मूल धर्म है और धर्म का मूल अर्थ है और अर्थ का मूल राज्य है । कौटिल्य के अर्थशास्त्र में धर्म तथा काम दोनों ही क्रियाएं अर्थ पर निर्भर बताई गयी है । कौटिल्य का कहना है कि " संसार में धन ही वस्तु हैं , धन के अधीन धर्म और काम है । " उनके अनुसार जिस प्रकार ज्ञान को प्रतिक्षण प्राप्त किया जाता है , ठीक उसी प्रकार धन को भी कण - कण करके प्राप्त करना चाहिए । धन की प्राप्ति हमेशा ही लाभदायक है अगर उसको एक अच्छी पत्नी , अच्छे पुत्र अथवा अच्छे मित्र के पोषण के लिए या धर्मार्थ उस उद्देश्य से प्राप्त किया जाए । अतः कौटिल्य ने उस धन अर्जन को न्याय संगत बताया है जो उचित प्रकार से अर्जित किया जाता है । 


कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ में कृषि , पशुपालन और व्यापार को वार्त्ता कहा है । कौटिल्य ने अर्थशास्त्र को निम्न शब्दों में परिभाषित किया है " मनुष्यों के व्यवहार या जीविका को अर्थ कहते हैं । मनुष्यों से युक्त भूमि का नाम ही अर्थ हैं । ऐसी भूमि को प्राप्त करने , विकसित करने ( या पालन पोषण करने ) के उपायों को निरूपण करने वाला शास्त्र ही अर्थशास्त्र कहलाता है । " अर्थशास्त्र की इतनी सटीक और स्पष्ट परिभाषा कौटिल्य से पूर्व विश्व में आज तक किसी भी विद्वान ने नहीं दी हैं वे आगे लिखते है कि यही अर्थशास्त्र धर्म , अर्थ और काम में प्रवत्त करता है उसकी रक्षा करता है । 


सार्वजनिक वित्त ( Public Finance ) 


कौटिल्य के अनुसार राजा का यह कर्त्तव्य है कि वह समय - समय पर उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों तथा राज्य व्यवस्था के लिए आय की अधिकाधिक वृद्धि करे क्योंकि राज्य के सभी कार्य कोष पर निर्भर करते हैं । जिस राजा का कोष रिक्त हो जाता है वह नगरवासियों तथा ग्रामवासियों को चू लगता है । कौटिल्य की सार्वजनिक वित्त व्यवस्था सही अर्थों में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से जुडी हुई थी । उन्होंने शांति व्यवस्था एवं न्याय के अतिरिक्त राज्य के चार उद्देश्य बताए हैं 

( 1 ) अप्राप्त को अर्जित करना ,

 ( 2 ) प्राप्त की रक्षा करना , 

( 3 ) रक्षित का संवर्द्धन करना , तथा 

( 4 ) सर्वद्धित को प्रजा के कल्याण के लिए प्रयुक्त करना अर्थात करो से प्राप्त आमदनी को प्रजा के कल्याण हेतु व्यय करना । कौटिल्य कहते है कि वित्त से धर्म की रक्षा होती है अतः राजकोष भरा रहना चाहिए । कोष के बिना राज्य न तो विकास कर सकता है और न उन्नति । 


( 1 ) सार्वजनिक आय ( Public Income ) कौटिल्य ने दण्डनीति को त्रयी , वार्त्ता और आन्वीक्षिकी के भलीभांति कियान्वयन के लिए उत्तरदायी माना है । 


राजकीय आय के स्रोत 

कौटिल्य द्वारा बताये गये राजकीय आय के स्रोत निम्नलिखित है

 

 i . विभन्न प्रकार के भूमि कर , शहरों में मकान कर , आकस्मिक कर आदि ।

 ii . बाजार में बेची जाने वाली वस्तुओं पर कर , आयात निर्यात कर ,

 iii . मार्ग कर , नहर कर तथा लादने वाली भारी गाड़ियों पर कर , 

iv . कलाकार कर , मत्स्य कर , 

V.द्यूतकर तथा नशीली वस्तुओं पर कर

vi . सम्पत्ति कर , वनोत्पादन कर , खान कर , नमक आदि वस्तुओं पर एकाधिकारिक कर ,

vii . श्रमिक कर , 

viii .आकस्मिक आय कर , 

 ix . ऋण पर ब्याज , 

X. खैराती कर , 

xi . जुर्माना 

xii . राज्य के लाभ घोड़ो , ऊन , हाथीकर , फल एवं वृक्ष कर , कुछ प्रमुख करों का विवरण निम्न प्रकार है -


1. भूमिकर - कृषि राज्य आय का प्रमुख स्रोत थी । समाज के लोग जितनी भूमि अपने अधिकार में रखकर उत्पादन करते थे , उसके बदले में राजा को उत्पादन का 1/6 भाग कर के रूप में देते थे । राज्य के अधिकारी समाहर्त्ता , गोप , स्थानिक आदि राजकीय आय प्राप्त करते थे । इन सभी के अपने - अपने क्षेत्र बंटे हुए थे । कर का भुगतान नकद तथा वस्तुओं के रूप में किया जाता था । 


2. - शुल्क – शुल्क ( चुंगी ) राज्य के बाहर या भीतर लाने या ले जाने वाली वस्तुओं पर लगायी जाती थी । शुल्क चौकियों पर लिया जाता था । चुंगी लेने वाले • अधिकारी को ' शुल्काध्यक्ष ' कहा जाता था जो चुंगी घरो का निर्माण कर अपने सहायकों द्वारा चुंगी वसूल कर राजकोष में जमा कराता था । कौटिल्य ने शुल्क के • तीन विभाग किए है - ब्राह्य , अभ्यांतर , तथा आतिथ्य । अपने देश में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं पर जो चुंगी ली जाए वह ब्राह्य कहलाती है , दुर्ग व राजधान भीतर उत्पन्न वस्तुओं के शुल्क को ' अभ्यातर विदेश से आने वाले माल की चुंगी को ' आतिथ्य ' कहा जाता है । 


3. खनन से प्राप्त आय - कौटिल्य के अनुसार राज्य की भूमि पर राज्य का अधिकार है अतः भूगर्भ पदार्थो से कर प्राप्त करने का अधिकार राजा को है । खान का अध्यक्ष शंख , वज्र , मणि , मुक्ता तथा सभी प्रकार के क्षारों की उत्पत्ति व विक्रय की व्यवस्था करता था । विदेश से आयातित नमक पर छठा भाग कर लेना चाहिए | धातुओं की चोरी करने वाले व्यक्ति पर चोरी का आठ गुना दण्ड लगाना चाहिए । रत्नों की चोरी करने पर प्राणदण्ड दिया जाना चाहिए ।


4. मार्ग कर - कौटिल्य के अनुसार राजा को अपने अन्तःपाल ( सीमा के रक्षकों ) के माध्यम से व्यापारियों से मार्ग कर वसूलना चाहिए । व्यापार के सामान से भरी एक गाड़ी पर 1½ पण , पशु पर 1/2 पण , छोटे पशुओं पर 1/4 पण तथा मनुष्य के कंधे पर ढ़ोये गये सामान पर एक माष कर लगता था । 


5. पशु कर - मुर्गे और सूअर पालने वाले उनकी आय का आधा हिस्सा राज्य को कर के रूप में देवें । भेड़ - बकरी पालने वाले छठा हिस्सा , गाय , भैंस , गधा एवं ऊट पालने वाले आय का दसवां हिस्सा राज्य को कर देवें । 


6- आपातकालीन कर - राज्य पर विपदा आने पर कौटिल्य ने आपातकालीन करों के लिए विधान किया है । कौटिल्य के अनुसार कोष खाली होने पर राजा धनिकों पर कर लगा सकता है । विपत्ति के समय राजा , व्यापारियों , वैश्याओं , पशुपालकों से विशेष याचना करके धन ले सकता है ।


करारोपण के नियम ( Connons of Taxation ) 


कौटिल्य के अर्थशास्त्र में करारोपण के अनेक नियमों का वर्णन है जो कर की दर , राशि वसूली का ढंग और कर लगाने के तरीकों से सम्बन्धित है । 


1 . उचित समय पर कर वूसली कौटिल्य के अनुसार कृषि से कर तभी वसूला जाना चाहिए जब फसल पकी हो । राजा को असमय कर लगाकार धन संग्रह नहीं करना चाहिए । 


2. उचित एवं न्यायपूर्ण करारोपण - राजा अपनी मनमानी से कर वूसली नहीं करे । आपत्ति के समय राजा कोभारी कर लगाने के लिए प्रजा से स्नेहपूर्वक तथा एक ही बार कर लेना चाहिए तथा अनुपजाऊ भूमि पर तो भारी कर लगाना ही नहीं चाहिए । राजा को प्रजा से कर कोयला बनाने के लिए वृक्ष को जड सहित काटने वाले की भांति न होकर पुष्प संचय करने वाले माली की नीति का अवलम्बन करना चाहिए । 


3. सामर्थ्य के अनुसार करारोपण कौटिल्य के अनुसार सभी व्यक्तियों से उनकी हैसियत के अनुसार कर लेना चाहिए । 


4. वित्तीय अनुशासन को प्रमुखता - कौटिल्य अपव्यय के विरोधी थे । उनका मत था कि प्रजा से जितना कर लिया जाए वह सम्पूर्ण धन राजकोष में जमा होना चाहिए । कौटिल्य राज्य कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में कहते है कि " जैसे जीभ पर रखे हुए मधु या विष का स्वाद लिए बिना नही रहा जाता , उसी प्रकार धन एकत्र करने वाला अधिकारी भी धन लिए बिना नहीं रह सकता । आकाश में उड़ने वाले पक्षी की गति का पता लगाया जा सकता है पर गुप्तरूप से धन का अपहरण करने वाले राज्य कर्मचारी का पता नहीं लगाया जा सकता है । अतः अच्छी तरह परीक्षा करके ही राजस्व कर्मचारी नियुक्त करने चाहिए । "


( B ) सार्वजनिक व्यय ( Public Expenditure ) एक और जहां अर्थशास्त्र में राजकीय आय के स्त्रोतों का उल्लेख है वहीं दूसरी ओर आचार्य कौटिल्य ने सार्वजनिक व्यय का भी विवेचन किया है । सार्वजनिक व्यय की प्रमुख मदों में धार्मिक कार्य अधिकारियों के वेतन एवं पेंशन का भुगतान , सैन्यशक्ति का संगठन , कारखानों का प्रबंध , श्रमिकों के वेतन का भुगतान , कृषि पर व्यय , शिक्षण संस्थाओं की स्थापना , सड़कों व नहरों का निर्माण , जंगलों की सुरक्षा पर व्यय , पशुओं पर व्यय , राजकीय गृहकार्यो का प्रबंध आदि को शामिल किया गया है ।


 ( C ) बचत की अवधारणा - - ( Concept of Savings ) 

कौटिल्य ने बचत की अवधारणा को भी प्रतिपादित किया है । उनके अनुसार राज्य के आय - व्यय का भलीभांति हिसाब करने पर जो शेष रहता है वह धन ' नीवी ' ( बचत ) कहलाता है । बचत दो प्रकार की होती है ( 1 ) प्राप्त ( 2 ) अनुवृत प्राप्त वह है जो राजकीय खजाने में जमा हो ( वास्तविक बचत ) । अनुवृत वह है जो खजाने में जमा किया जाने वाला हो ( प्रत्याशित बचत |


( D ) आय व्यय का लेखांकन ( Accounting of Income and Expenditure ) कौटिल्य के अनुसार सार्वजनिक आय - व्यय का लेखा रखना राजा के लिए अनिवार्य है । उनके अनुसार कोषाध्यक्ष को नगर या जनपद से प्राप्त होने वाली आय की अच्छी तरह जानकारी होनी चाहिए । यदि उससे पिछले सौ वर्ष की आय का लेखा जोखा पूछा जाए तो तत्काल ही वह उसकी समुचित जानकारी दे सके । बचे हुए धन को सदा कोष में दिखाता रहे । राजा को कोष पर सर्व प्रथम ध्यान देना चाहिए । उनके अनुसार आय व्यय निरीक्षक अक्षपटल ( एकाउन्टेन्ट्स ऑफिस ) का निर्माण करावें , आय व्यय के लेखों की नियमित व्यवस्था करावें । सभी कार्यालयों के अध्यक्ष आषाढ के महीने में वर्ष की समाप्ति पर प्रधान कार्यालय में आकर हिसाब का मिलान कर राजकीय आय - व्यय व बचत को प्रजाजनों को समझाए । आय - व्यय रजिस्टर में माह , पक्ष एवं दिन , काल , लेखक का नाम तथा लेने वाले का नाम अंकित हो । इसी प्रकार व्यय का लेखा भी तैयार करावें तथा अंत में नीवी ( बचत या शेष ) का पूर्ण विवरण तैयार रखना चाहिए । उन्होंने राजकीय आय व्यय में गड़बड़ी करने पर लेखाधिकारियों को दण्डित करने का प्रावधान किया है । उनके अनुसार प्राप्त आय को रजिस्टर में न चढाना , नियमित कर को रिजस्टर में चढाकर भी खर्च न करना और प्राप्त बचत के संबंध में मुकर जाना , यह तीन प्रकार का ' अपहार ' कर चुराने वाला ( Abejilment ) है । अपहार के द्वारा राजकोष को हानि पंहुचाने वाले अध्यक्ष को हानि से बारह गुना दण्डित करना चाहिए । इस प्रकार कौटिल्य की कर प्रणाली में विविधता , समानता , न्यायशीलता , लोचशीलता आदि सभी गुण विद्यमान थे तथा कर से प्राप्त आय को कल्याणकारी कार्यों पर व्यय करने का प्रावधान भी किया था ।


 कृषि व्यवस्था ( Agriculture System ) 


कौटिल्य ने अपनी पुस्तक ' अर्थशास्त्र ' में कृषि को विशेष महत्व दिया है । उनके अनुसार राजा को अच्छा कृषि अधिकारी नियुक्त करना चाहिए जो अनाज , फलों , सब्जियों , कपास आदि का अच्छा बीज उनकी फसलों के लिए उचित समय पर इकट्ठा करे । जिस भूमि पर कृषि न हो सके वहां पशुओं के लिए चारागाह आदि बनवा दिए जाने चाहिए । कौटिल्य के अनुसार मौसम के अनुरूप बीज होने चाहिए । उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में घी , शहद , दूध का खाद- । वनस्पतियों में डालने का धर्मशास्त्रों में वर्णन किया गया है । वे कपास , आम आदि के बीजों को गोबर के साथ मिलाकर फिर बोने की सलाह देते हैं । उनके अनुसार खेती में गंदा खाद नहीं डालना चाहिए तथा उत्तम खाद का ही प्रयोग करना चाहिए ।


  सिंचाई - कौटिल्य के अनुसार राज्य को नदियों पर बांध , तालाब बनाकर सिचांई की व्यवस्था करनी चाहिए । कौटिल्य के अनुसार नदी , झील , तालाब तथा कुओं से सिचाई करने पर उपज का चौथा भाग सिचांई कर के रूप में राजा को देना चाहिए । उन्होंने बांधो व नहरों को नुकसान पहुंचाने वालों को दण्ड देने की व्यवस्था का प्रतिपादन भी किया है ।


 कृषि ऋण व सहायता कौटिल्य राजा को निर्देश देते है कि वह अन्न , बीज , बैल आदि के लिए किसानों को धन आदि देकर सहायता करें तथा फसल कटने के बाद उधार ली गयी रकम व वस्तुओं को प्राप्त करें । योग्य तथा अच्छे किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए राजा को ' ऋण पर अनुदान ' भी देना चाहिए । उनके अनुसार किसानों को स्वास्थ्य वृद्धि तथा रुग्णता निवारण हेतु सीमित धन देना चाहिए ताकि वे धन– धान्य में वृद्धि करके राजकोष में वृद्धि करें । 


पशुपालन - अर्थशास्त्र में गो , भैंस आदि पालतू पशुओं की देखरेख के लिए ' गोध्यक्ष ' नामक अधिकारी की नियुक्ति का वर्णन मिलता हैं । पशुओं के चरने के लिए गोचर भूमि का उल्लेख किया गया है । पशुओं को चराने वाले ग्वालों के लिए मजदूरी निर्धारित की गयी थी । प्रत्येक पशु के लिए एक एक पण वार्षिक पारिश्रमिक का निर्धारण किया गया है । कौटिल्य पशुधन की प्रधानता को देखते हुए उनके खाने पीने के प्रबंध से लेकर उन्हें क्षति पहुंचने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही के विधानों का उल्लेख करते हैं । 


मजदूरी निर्धारण व्यवस्था एवं सामाजिक सुरक्षा ( Wage determination system & social security ) –


 कौटिल्य ने विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए श्रमिकों की मजदूरी तथा उनके कल्याण हेतु अनेक प्रावधानों का प्रतिपादित किया है । उन्होंने विभिन्न व्यवसायों में कार्य करने वाले मजदूरों को दो भागों में विभक्त किया था । ( 1 ) कुशल मजदूर ( 2 ) अकुशल मजदूर । कुशल अकुशल श्रमिकों को कार्य के अनुसार वेतन दिया जाता था । कौटिल्य के अनुसार यदि एक धरण चांदी को नई वस्तु बनायी जाए तो श्रमिक को एक ' माषक ' वेतन दिया जाना चाहिए , सोने की बनवाई के लिए


8 वां हिस्सा वेतन दिया जाए तथा विशेष कारीगरी करने पर दुगनी मजदूरी दी जावें । कौटिल्य के अनुसार जिन श्रमिकों का वेतन पहले से तय नहीं हो उन्हें उनके कार्य तथा समय के अनुसार वेतन दिया जाना चाहिए । सूत व्यवस्था के अध्यक्ष नियत कार्यकाल तथा निश्चित वेतन के अनुसार ही कारीगरों को कार्य पर नियुक्ति करे और सूत की मोटाई तथा गुणवत्ता के अनुसार ही महिला मजदूरों की मजदूरी निश्चित करे । 


मजूदरी निर्धारण के सिद्धान्त


 कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मजदूरी निर्धारण के अनेक सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है । कौटिल्य की वेतन निर्धारण की अवधारणा गतिशील अवधारणा थी जिस कारण उन्होंने अलग - अलग व्यवसायों , कार्यों व श्रमिकों की उत्पादकता के आधार पर अलग - अलग निमयों की व्यवस्था की । 


1 . मजदूरी का जीवन निर्वाह सिद्धान्त ( Cost of Living theory of wages ) 


कौटिल्य कहते है कि एक मजदूर की मजदूरी इतनी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए कि जिससे वह अपने आपको शारीरिक सुविधाएं दे सके और अपने मालिक की सेवा पूरे उत्साह व निष्ठा के साथ कर सके तथा वह किसी प्रकार के लालच एवं असंतुष्टि से मुक्त र सके । कौटिल्य का यह विधान मजदूरी के जीवन निर्वाह सिद्धान्त की और संकेत करता है । 


2. मजूदरी की योग्यता व कार्यकुशलता सिद्धान्त ( Ability theory of wages ) - 


अलग - अलग मजदूरी की योग्यता अलग - अलग होती है । कुशल व अकुशल मजदूरों की मजदूरी एक म नही दी जा सकती है । कौटिल्य राजा को सुझाव देते हैं कि राजा को विशेष योग्यता वाले सरकारी कर्मचारियों को उनके ज्ञान व विशेषीकरण के आधार पर मजदूरी व भत्ते निर्धारित करने चाहिए । 


3. मजदूरी का उत्पादकता का सिद्धान्त ( Productivity theory of wages ) - 


कौटिल्य स्पष्ट रूप से कहते है कि मजदूर का वेतन उसके द्वारा किए गये उत्पादन की मात्रा तथा उस उत्पादन में लगे समय के अनुपात में होना चाहिए । केवल उसी कार्य का वेतन मिलना चाहिए जो मजदूर द्वारा किया जा चुका हो । सूत कातने वाले को मजदूरी सूत की मोटाई , किस्म अर्थात उत्पादन की गुणवत्ता देखकर देनी चाहिए । वे सरकारी कर्मचारियों को भी योग्यता एवं कार्यक्षमता के अनुरूप कम या अधिक वेतन देने का विधान करते हैं । 


4. वेतन का प्रथागत सिद्धान्त ( Customary theory of wages ) 


कुछ ऐसे व्यवसाय थे जिनमें मजदूरी निर्धारण का कोई निश्चित नियम नही था ऐसे व्यवसायों में प्रथा के अनुसार नकद या वस्तु के रूप में मजदूरी दी जानी चाहिए । कौटिल्य कहते है कि कारीगर , नट , चिकित्सक , वकील , नौकर को वैसा ही वेतन दिया जाए जैसा कि अन्यत्र दिया जाता है अथवा जो भी वेतन कुशल पुरूष निश्चित कर दे । इसके अलावा कौटिल्य ने कार्य संस्कृति पर भी बल दिया है । उनके अनुसार यदि कोई श्रमिक वेतन लेकर भी कार्य नहीं करे तो उसे दण्ड दिया जाना चाहिए । कौटिल्य लिखते है कि वेतन कार्य करने का दिया जाता है खाली बैठने का नहीं । कार्य पर उपस्थिति मात्र से ही मजदूरी नही दी जानी चाहिए । ठीक से कार्य नही करने वाले मजदूरों की सात दिन की • मजदूरी दबाए रखनी चाहिए । इतने पर भी वह ठीक से कार्य नहीं करे तो उसका कार्य दूसरों को दे देना चाहिए अर्थात कार्य से हटा देना चाहिए ।


5. मजदूरी का भागेदारी सिद्धान्त ( Share theory of wages ) - 

कुछ ऐसे व्यवसाय जहां पर पहले से ही मजदूरी की दर निर्धारित नहीं की जा सकती हो वहा एक ऐसी परम्परा रही है कि मजदूर को उत्पादनों से एक निश्चित हिस्सा दिया जाता था । चाणक्य के अनुसार किसान का नौकर अनाज का ग्वाले का नौकर घी का तथा बनिए का नौकर अपने द्वारा व्यवहार की हुई वस्तुओं का दसवां हिस्सा ले , बशर्ते उनका वेतन पहले तय नहीं हुआ हों । कौटिल्य के अनुसार राज्य द्वारा कर्मचारियों के वेतन निर्धारण के लिए राज्य की आवश्यकता , धर्म तथा नैतिकता , सेवा योग्य वेतन , राज्य के प्रति निष्ठा , नौकरों के गुण , कार्य का सम्पादन आदि कारको को ध्यान में रखना चाहिए तथा कभी भी राज्य को अपनी आय का एक चौथाई भाग से अधिक वेतन मद पर व्यय नहीं करना चाहिए । 



सामाजिक सुरक्षा प्रावधान ( Provisions of social security ) - 


कौटिल्य ने न केवल मजदूरी को कार्य एवं उत्पादकता से जोड़ा तथा कार्य संस्कृति की अवधारणा का प्रतिपादन किया बल्कि मजदूरों के कल्याण तथा सुरक्षा हेतु अनेक योजनाओं का प्रावधान भी किया है । जिन मजदूर कल्याणकारी योजनाओं का कौटिल्य ने विवेचन किया है उनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित है -


 1 . पेंशन योजना - कौटिल्य के अनुसार यदि कार्य करते हुए किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाए तो उसका वेतन पेंशन के रूप में उसके पुत्र पत्नि को दिया जाना चाहिए । पेंशन के अलावा राजा को मृत कर्मचारी के बच्चों , वृद्धों तथा बीमार व्यक्तियों को आर्थिक सहायता के अलावा उनके घरों में मृत्यु , बीमारी या बच्चा होने पर उनकी आर्थिक सहायता करनी चाहिए । कौटिल्य का यह प्रावधान सरकार के अपने कर्मचारियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण को इंगित करता है । 


2. अवकाश के नियम - कौटिल्य कहते हैं कि यदि त्यौहारों या छुट्टी वाले दिनों में महिला मजदूरों से कताई बुनाई का कार्य करवाया जाता है तो उन्हें भोजन , दाल , तथा सामान के अलावा अतिरिक्त मजदूरी का भुगतान किया जाना चाहिए । मजदूर आकस्मिक कार्य आने पर , बीमार होने पर या किसी विपत्ति में फंसने पर आकस्मिक अवकाश ले सकता है अथवा अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को भेजकर छुट्टी ले सकता है । 


 3 . गरीब तथा असहायों को रोजगार में प्राथमिकता - कौटिल्य ने यह प्रावधान किया था कि विधवा , अपाहिज महिलाएं , कलाकार आदि को कताई बुनाई के कार्यों में राजा को प्राथमिकता से रोजगार देना चाहिए । कौटिल्य ने कताई बुनाई कार्य में ओवर टाईम का भी प्रावधान किया था । कारीगरों के परिवार के सदस्य अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते थे । नौकरों को यथोचित वेतन प्राप्त होना चाहिए । स्थायी व अस्थायी कर्मचारियों की योग्यता और कार्यक्षमता के अनुसार कम या अधिक वेतन प्राप्त होना चाहिए । कर्मचारियों के वेतन तथा भत्तों के संबंध में राजा को बारीकी से विचार करना चाहिए ।



श्रमिक संघ ( Labour Unions ) 


कौटिल्य ने विभिन्न संघो का उल्लेख करते हुए उन्हे अत्यन्त शक्तिशाली बताया 1 उन्हें श्रेणी , कुल , गण या संघ नामो से पुकारा जाता था | इन संघो के माध्यम से राज्य की आर्थिक एवं गैर आर्थिक क्रियाओं पर विचार किया जाता था । ये संघ अपने सदस्यों के हितों क रक्षा करते थे । उन्हें हम आधुनिक श्रमिक संगठनों के रूप में देख सकते है । कौटिल्य ने संघो के मुख्यतः निम्न प्रकार बताए है - ( 1 ) बुनकर ( 2 ) खान कार्यकर्ता संघ ( 3 ) पाषाण कलाकारी ( 4 ) बढईगिरी ( 5 ) पुरोहित ( 6 ) गायक ( 7 ) न्यूनतम कलाकार ( 8 ) क्रय - विक्रयकर्त्ता ( 9 ) सेवा संघ आदि । 


व्यापार एवं वाणिज्य ( Trade & Commerce ) 


विनिमय व्यवस्था कौटिल्य के अनुसार विनिमय वस्तुओं तथा मुद्रा दोनों के माध्यम से होता था । किसी वस्तु के बदले दूसरी वस्तु को लेने की प्रक्रिया को वस्तु विनिमय कहते है । कौटिल्य के अनुसार एक अनाज देकर उसके बदले दूसरा अनाज लेना लाभकारी वस्तु विनिमय ( परिवर्तक ) कहलाता है । कौटिल्य ने मौद्रिक विनिमय का भी वर्णन किया है । कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में चार प्रकार की मुद्राओं का वर्णन किया है ( i ) सोने के सिक्के ( ii ) कार्षापण या पण या धरण ( चांदी का ) ( iii ) मानक तांबे का तथा ( iv ) कांकणी तांबे का । उन्होंने सभी मुद्राओं को दो श्रेणियों बांटा है- प्रथम कोटि में कोष प्रवेश्य मुद्राएं आती थी , सम्पूर्ण राज कार्यों में इन्हीं मुद्राओं का प्रयोग होता था । द्वितीय कोटि में व्यावहारिक मुद्राएं थी । जनता का साधारण लेनदेन इन्ही मुद्राओं द्वारा हो सकता था । परन्तु राजकीय कोष में प्रवेश नही कर सकती थी । मुद्रा निर्माण केवल सरकारी टकसाल में होता था । कोई भी व्यक्ति अपनी धातु टकसाल में ले जाकर अपने लिए मुद्राएं बनवा सकता था । इसके लिए निश्चित शुल्क देना पड़ता था । टकसाल के अधिकारियों के नाम ' सौवर्णिक ' तथा ' लक्षणाध्यक्ष ' थे । - व्यापार की सुविधा के लिए उचित मुद्रा व्यवस्था एवं नाम तौल की व्यवस्था की गयी थी । कौटिल्य ने द्रव्य के दो कार्य माने है ( 1 ) विनिमय का माध्यम एवं ( 2 ) कोष में धन जमा करने के लिए विधि ग्राह्य माध्यम बांटो पर चिन्ह लगे हुए होते थे । उन्होंने 16 प्रकार के तराजुओं का उल्लेख किया है ।


कौटिल्य ने सोना - चांदी , भारी वस्तुओं , लम्बाई नापने , वस्त्र नापने आदि का वर्णन किया गया है । माप और तौल की जांच के लिए राजा को सरकारी अधिकारी ' पौतवाध्यक्ष की नियुक्ति करनी चाहिए । 


वस्तुओं की कीमत निर्धारण ( Price determination of goods and services ) - 


कीमत निर्धारण के क्षेत्र में कौटिल्य ने न्यायपूर्ण अथवा उचित कीमत की अवधारणा का प्रतिपादित किया है । उन्होंने न्यायपूर्ण कीमत में वस्तु की लागत तथा उचित लाभ को शामिल किया है । न्यायपूर्ण कीमत न तो समाजवादी अर्थव्यवस्था की तरह उत्पादक की प्रेरणा को कम करती है और न ही पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तर उपभोक्ता की जेब पर भार डालती है । यदि कीमत लागत से नीची रहती है तो उत्पादक उत्पादन करना बंद कर देंगे तो बेरोजगारी फैलेगी , दूसरी तरफ कीमते उंची होने पर उपभोक्ता मांग कम देंगे । अतः दोनो ही स्थितियों में उत्पादन में कमी होने पर बेरोजगारी बढेगी । कौटिल्य के अनुसार वस्तुओं की कीमत का निर्धारण राजा द्वारा नियुक्त अधिकारी पण्याध्यक्ष तथा संस्थाध्यक्ष को करना चाहिए । वस्तुओं की कीमत के निर्धारण के लिए कौटिल्य पण्याध्यक्ष ( वाणिज्य के अध्यक्ष ) को सुझाव देते हैं कि उसे यह पता लगाना चाहिए कि वस्तु की मांग बाजार में है या नहीं । कौटिल्य कहते हैं कि कीमतों में उच्चावचन मांग व पूर्ति से जुड़ा हुआ है । वस्तु की कीमत में वृद्धि मांग बढ़ने से होती है तथा वस्तुओं की पूर्ति बढ़ने से कीमतें घटती हैं । इस प्रकार कौटिल्य वस्तु के मूल्य निर्धारण में मांग व पूर्ति सिद्धान्त की व्याख्या के साथ राजकीय नियन्त्रण की भी व्यवस्था करते है । कौटिल्य के अनुसार वस्तुओं की कीमत को कई तत्व प्रभावित करते हैं | समाज , वेतन , परिवहन व्यय , किराया आदि व्ययों का प्रतिदान तय कर वस्तुओं का मूल्य तय करें । कौटिल्य कें अनुसार संस्थाध्यक्ष ( बाजार अध्यक्ष ) को अन्य तत्वों के साथ समाज का भी ध्यान रखना चाहिए । वे सुझाव देते हैं कि दूध , सब्जियां आदि शीघ्रनाशक वस्तुओं को जितना जल्दी हो सके किसी भी कीमत पर किसी भी स्थान पर तथा किसी भी मूल्य पर बेच देना चाहिए क्योंकि ये वस्तुएं शीघ्र नष्ट हो जाती है । कौटिल्य कहते है कि यदि व्यापारियों तथा मजदूरों की तरफ से कीमतें बढ़ती है तो यह न्याय सिद्धान्त के विपरीत है । अतः वस्तुओं की कीमत का निर्धारण देश तथा समय के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए ।


कौटिल्य बाजार की व्यवस्थाएं तथा उनका नियमन - 


विश्व का प्रथम चितंक था जिसने बाजार को नियमित करने के लिए विस्तृत एवं सुनियोजित योजना प्रस्तुत की । उन्होंने मिलावट व धोखाधड़ी से बचाने , तस्करी व कालाबाजारी से बचाने , आगामी विक्रय को रोकना , सामान बेच देने के बाद सामान नहीं देना आदि अव्यवस्थाओं को रोकने के लिए पांच प्रकार के अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया 


1 . पण्याध्यक्ष - यह अधिकारी वस्तुओं का मूल्य निर्धारण एवं उनकी गुणवत्ता को देखता था तथा व्यापारियों की क्रियाओं पर निगरानी रखता था । 

2.- शुल्काध्यक्ष - यह राज्य में व्यापारियों से चुंगी वसूलने , माल पर मोहर लगाने तथा माल की तौल बिक्री आदि का कार्य करता था ।

3. संस्थाध्यक्ष - मिलावट को रोकने , घटिया वस्तुओं की बिक्री तथा कम तौल करने वालों को दण्डित करता था!

4. पौतवाध्यक्ष - इसका मुख्य कार्य तौर और माप जारी करना था ।

 5. अन्तःपाल - राज्य के अन्दर तथा विदेशों में आने जाने वाले माल की निगरानी का कार्य करता था । कौटिल्य ने मिलावट को रोकने के लिए भारी जुर्माने का प्रावधान किया है । उनके अनुसार अधिकृत व्यक्ति ही खाद्यान्नों का संग्रहण या व्यापार कर सकता है तथा वस्तुओं का विक्रय बाजार में ही होना चाहिए उत्पादन स्थान पर नहीं । कौटिल्य ने उत्पादकों को संरक्षण देने के लिए यह भी व्यवस्था की है कि यदि कभी मांग की तुलना में पूर्ति अधिक हो जाए तो बाजार अध्यक्ष को संग्रह करके बेचना चाहिए । कौटिल्य कहते है कि यदि व्यापारी आपस में मिलकर किसी वस्तु को अनुचित कीमतों पर खरीदे या बेचे तो उनमें प्रत्येक पर एक – एक हजार पण जुर्माना किया जाए । व्यापारियों द्वारा सट्टेबाजी व मुनाफाखोरी करके लाभ कमाने पर उन्होंने लाभ के नियतन का सुझाव दिया है । उनका कहना है कि घरेलू वस्तुओं पर 5 प्रतिशत तथा विदेशी वस्तओं पर 10 प्रतिशत से अधिक लाभ नहीं लेना चाहिए । इससे अधिक लाभ लेने पर 200 पण दण्ड का विधान किया है । 



व्यापार - कौटिल्य कहते हैं कि राज्य में उत्पन्न वस्तुओं की बिक्री का प्रबंध एक निश्चित स्थान पर होना चाहिए जबकि विदेशों में उत्पन्न वस्तुओं का विक्रय अनेक स्थानों पर करना चाहिए ताकि जनता को कष्ट ना हो । अनेक स्थानों पर बेची जाने वाली वस्तुओं को व्यापारी एक ही मूल्य पर बेचे । व्यवसायियों को राज्य का पूर्ण संरक्षण होना चाहिए । कौटिल्य विदेशों से ऐसी वस्तुएं आयात करने के पक्ष में थे जो आवश्यक थी । अतः वे विदेशी व्यापार पर करों में छूट के साथ राज्य द्वारा ऋण देने का विधान भी करते हैं । समुद्र से होने वाले जल मार्गों को कौटिल्य ने ' समानपथ ' तथा समुद्र से आने जाने वाले जहाजों को ' प्रवहण ' नाम दिया है । 


                व्यापार कौटिल्य ने राज्य व्यापार को प्रधानता दी पर राज्य व्यापार को जनता के हित में व्यवस्थित किया था । आयात निर्यात को प्रोत्साहित करने की नीति के साथ कौटिल्य ने कुछ वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का विधान किया । उनके अनुसार अस्त्रशस्त्र , अश्व तथा अन्न आदि का निर्यात वर्जित है तथा इन वस्तुओं का आयात निःशुल्क एवं कर मुक्त था । कौटिल्य के अनुसार व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य को जल व स्थल मार्ग और बड़े - बड़े बाजारों या मण्डियों का निर्माण करना चाहिए । राज्य व्यापारिक मार्गों पर व्यापारियों की सुरक्षा करे । बड़े - बड़े नगरों का निर्माण कर वहां बिकी योग्य वस्तुओं का संग्रह करके उनके क्रय विक्रय का प्रबंध करना चाहिए । कौटिल्य ने व्यापार से प्राप्त लाभ को भी निर्धारित किया था । कौटिल्य ने कीमतों के निर्धारण तथा क्रय विक्रय की गतिविधियों को एक महत्वपूर्ण दिशा दी है जिससे आम लोगो पर अनावश्यक भार नही पडे तथा उन्हे नुकसान नहीं उठाना पडे । आवश्यक वस्तुएं लोगो को उचित कीमतों पर बिना परेशानी प्राप्त होती रहे । 


- महत्वपूर्ण बिन्दू 

 ● कौटिल्य अर्थशास्त्र के प्रणेता माने गये है उन्हें चाणक्य , विष्णुगुप्त आदि नामों से भी जानते हैं । उन्होंने अर्थशास्त्र नामक ग्रन्थ लिखा । 

 ● अर्थशास्त्र की रचना का काल 321 एवं 300 ई.पू. के बीच माना जाता है । 

 ● कौटिल्य ने ज्ञान की चार शाखाओं में वार्त्ता ( अर्थशास्त्र ) को अधिक महत्व दिया है जिसमें कृषि , पशुपालन , उद्योग एवं व्यापार को प्रधानता दी गयी है । 


● कौटिल्य ने धर्म , अर्थ तथा काम में अर्थ को प्रधानता दी है । 

● करारोपण के नियम - उचित समय पर वसूली कर निर्धारण में मनमानी का निषेध , सामर्थ्य के अनुरूप कर , वित्तीय अनुशासन को प्रधानता । 

● कृषि राज्य आय का प्रमुख स्रोत थी । लगान उत्पादन का 1 / 6 भाग राजा को दिया जाता था । 

● शुल्क लेने वाले अधिकारी को ' शुल्काध्यक्ष ' कहा जाता था । कौटिल्य ने शुल्क के तीन भाग किए है बाह्य अभ्यान्तर एवं आतिथ्य |

● सार्वजनिक व्यय की मदों में धार्मिक कार्य , अधिकारियों का वेतन , कृषि पर व्यय , सड़कों व नहरों का निर्माण , जंगलों की सुरक्षा पर व्यय , पशुओं पर व्यय शामिल । 

● कृषि व्यवस्था - कृषि की देखभाल के लिए कृषि अधिकारी की नियुक्ति , खाद्य , सिंचाई , कृषि ऋण व सहायता तथा ऋणों पर अनुदान की व्यवस्था ।

● मजदूरी का नियम व सामाजिक सुरक्षा मजदूरी निर्धारण सिद्धांत , उत्पादकता का सिद्धांत , वेतन का प्रथागत सिद्धांत , मजदूरी का भागेदारी सिद्धांत | 

● सामाजिक सुरक्षा प्रावधान- पेंशन योजना , अवकाश के नियम , गरीब तथा असहायों को रोजगार में प्राथमिकता । 

● वाणिज्य - व्यापार विनिमय व्यवस्था वस्तुओं की कीमत का निर्धारण , राजा द्वारा नियुक्ति पण्याध्यक्ष तथा संस्थाध्यक्ष अधिकारियों द्वारा होना चाहिए कीमत निर्धारण में मांग व पूर्ति के अलावा सरकार द्वारा राजकीय नियंत्रण की व्यवस्था हो । 

● बाजार की अव्यवस्थाओं के नियमन हेतु अधिकारियों की नियुक्ति जैसे पण्याध्यक्ष , पौतवाध्यक्ष , अन्तःपाल , शुल्काध्यक्ष । 


वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1 . अभ्यासार्थ प्रश्न कौटिल्य द्वारा वर्णित ज्ञान की किस शाखा में आर्थिक विषयों का अध्ययन किया 

( अ ) त्रयी

( ब ) वार्ता 

( स ) आन्वीक्षिकी 

( द ) दण्डनीति 

उत्तर= ( ब ) वार्ता 


2. कौटिल्य ने धर्म का मूल किसे कहा है

 ( अ ) अर्थ

 ( ब ) काम 

( स ) मोक्ष 

( द ) कोई नहीं 

उत्तर= ( अ ) अर्थ


3. योग्य तथा अच्छे किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य द्वारा किस सहायता की व्यवस्था की है 

 ( अ ) सिंचाई व्यवस्था 

( ब ) अच्छे बीजों की व्यवस्था 

( स ) ऋण पर अनुदान 

( द ) अच्छे पशुओं की व्यवस्था 

उत्तर= ( स ) ऋण पर अनुदान 


4. कौटिल्य की शासन व्यवस्था में मिलावट रोकने , घटिया वस्तुओं की बिक्री तथा कम तौल करने वालों पर निगरानी निम्न में से कौनसा अधिकारी रखता है 

( अ ) पण्याध्यक्ष 

( ब ) अन्तःपाल 

( स ) पौतवाध्यक्ष 

( द ) संस्थाध्यक्ष

उत्तर= ( द ) संस्थाध्यक्ष


5. कौटिल्य के अनुसार विदेशों से आयातित माल पर सामान्यतः वस्तु की लागत का कितना हिस्सा चुंगी के रूप में लिया जाना चाहिए 

( अ ) 1 / 4 भाग 

( ब ) 1/5 भाग 

( स ) 1 / 6 भाग 

( द ) 1 / 8 भाग

उत्तर= ( ब ) 1/5 भाग 


6. कौटिल्य ने देश में उत्पादित वस्तुओं पर लाभ की दर निश्चित की थी

( अ ) 5 %       ( ब ) 10 %

( स ) 15 %      ( द ) 20 % 

उत्तर= ( अ ) 5 %   



 अतिलघूत्तरात्मक प्रश्न


 1 . कौटिल्य ने वार्ता में किन किन आर्थिक क्रियाओं को शामिल किया है ? 


2. कौटिल्य के बताए गये शुल्क के तीन विभागों के नाम लिखिए । 

3. कौटिल्य के अनुसार बचत ( नीवीं ) का अर्थ बताइए ।


4. कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित पेंशन योजना के प्रावधानों को समझाइए । 


5. कौटिल्य के अनुसार राज्य को आयातित माल पर उसकी लागत का कितना हिस्सा चुंगी लेनी चाहिए ।


6. कौटिल्य के अनुसार कृषि पर अनुदान कब दिया जाना चाहिए।


7. कौटिल्य ने बाजार की अव्यवस्थाओं के नियमन के लिए किन किन अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया है ।



निबन्धात्मक प्रश्न 

1. कौटिल्य के मत में वस्तु की कीमत को प्रभावित करने वाले तत्व कौन - कौन से हैं ? नाम बताइए । 


2. कौटिल्य द्वारा लिखित पुस्तक ' अर्थशास्त्र ' में वर्णित व्यापार के नियमों को स्पष्ट कीजीए |


3. कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित मजदूरी निर्धारण के सिद्धान्तों एवं सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों को समझाइए ।


4. कौटिल्य द्वारा बताए गये राजकीय आय के स्रोतों को बताइए ।


5. कौटिल्य की कर व्यवस्था में करारोपण के नियमों कोसमझाइए । 


6. कौटिल्य के मत में अपहार का तात्पर्य क्या है ?


7. कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित कर्मचारियों के अवकाश के नियमों को समझाइये । 


 8 . कौटिल्य द्वारा वर्णित श्रम संघो के मुख्य प्रकार बताइये । 


निबन्धात्मक प्रश्न

 1 . कौटिल्य की सार्वजनिक वित व्यवस्था को समझाइए । 


2. कौटिल्य के अनुसार शुल्क किसे कहते हैं तथा उनके द्वारा प्रतिपादित शुल्क के निमयों को स्पष्ट किजिए । 


3. कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित मजदूरी निर्धारण के सिद्धान्तों एवं सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों को समझाइए । 


4. कौटिल्य के राजकीय आय व्यय सम्बन्धी विचारों को स्पष्ट किजिए |


5. कौटिल्य के बाजार संगठन तथा मापतौल की व्यवस्था पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए | 


6. कौटिल्य ने बाजार की अव्यवस्थाओं के नियमन हेतु कौन - कौन से प्रावधान किए थे । समझाइए । 


 संदर्भ ग्रंथ 1 . कौटिलीय अर्थशास्त्रम् : गैरोटा चोरखम्भा प्रकाशन , वाराणसी । वैदिक साहित्य में अर्थपुरूषार्थः राणा अमर ग्रन्थ पब्लिकेशन्स , नई दिल्ली ।


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